Tuesday, 28 June 2016

`उड़ता पंजाब' हरित क्रांति की विषाक्त विरासत के प्रति हमारी आंखें खोलता है

चित्र - http://punjab2000.com


[ डा वन्दना शिवा के लेख का हिन्दी अनुवाद । मूल लेख अंग्रेजी में यहा सकते हैं -
 http://www.thequint.com/opinion/2016/06/22/how-udta-punjab-compels-us-to-ponder-upon-green-revolution-pahalaj-nihalani-farmer-crisis-pesticide  ]

उड़ता पंजाब कई ऐसी सामाजिक और और पारिस्थितिक संकटों पर प्रकाश डालता है जो गैर-टिकाऊ औद्योगिक रसायनिक खेती की देन है जिसे लोगों को गुमराह करने के लिये हरित क्रांति का नाम दिया गया था । फिल्म में एक दृश्य है जिसमें एक जाँच की चौकी पर पुलिस वाले ड्रग से भरे एक ट्रक को रोकते हैं । वह ड्रग की समस्या को `हरित क्राँति २.२ ' की शुरुआत का नाम देते हैं और पंजाब की तुलना मेक्सिको से करते हैं ।

पंजाब में शुरु की गई हरित क्राँति को इस बात के लिये नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया था कि नए बीज और रसायन खेती समृद्धि और शांति लाएंगे । लेकिन १९८४ तक पंजाब हिंसा और युद्ध का क्षेत्र बन चुका था ,जहाँ ३०,००० लोगों की मौत हो चुकी थी । हरित क्राँति के इस मिथक और पंजाब में हो रही हिंसा की सच्चाई ने ही मुझे पंजाब पर अनुसंधान करने को मजबूर किया था ।

                                                                 https://youtu.be/dR7lzbs4iSc 

किस प्रकार रसायनों ने किसानों को बर्बाद किया
हरित क्रांति ने किसानों को पारिस्थिक नशीली पदार्थों यानि रसायन उर्वरकों और कीटनाशकों का आदी बनाया । उनका जितना ज्यादा इस्तेमाल किया गया जरूरत उतनी बढ़ती गयी । वास्तव में पूरी हरित क्राँति की कहानी यही है - कीटनाशकों पर पले उपजे बीजों का वितरण और किसानों का उनका आदी बनना और रसायनिक खेती के ट्रेडमिल (दुष्चक्र) पर सवार हो जाना जिससे उत्पादन की कीमत और उनका ऋण समय के साथ बढ़ता गया और समाजिक संकट बढ़ते गए ।
पंजाब में ड्रग की समस्या हरित क्रांति से पैदा हुई समस्याओं का एक पहलू है और चूँकि उसकी जड़ को कभी काटा नहीं गया आज इस समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है और इसे हरित क्रांति २.२ का नाम दिया गया है ।

हरित क्रांति के प्रतिकूल प्रभाव
पारिस्थितिक टिकाऊ खेती का आधार महिलाएं हैं और युवा अपने माता-पिता के खेती के काम को संभालते हैं। हरित क्रांति के आने पर लोगों के काम मशीनों द्वारा किये जाने लगे इसलिये यह महिलाओं और युवाओं के बेकारी का कारण है । इसके कारण कन्या भ्रूण ह्त्या जैसी नयी समस्या की शुरुआत हुई ।
युवाओं की बर्खास्तगी से उनके जीवन का अर्थ और महत्व खत्म हो गया । बेकार महसूस करने वाले ड्रग जैसी लतों के आदी जल्दी होते हैं । साथ ही जैसे जैसे धरती की पैदावार की क्षमता घटती जाती है नशीली पदार्थों का व्यापार नयी अर्थव्यवस्था बन जाता है । लेकिन यह ऐसी अर्थव्यवस्था है जिसमें युवाओं का जीवन नष्ट हो जाता है और सिर्फ नशा बेचने वाले अमीर बनते हैं ।
श्री जरनैल सिंह भिंद्रांवाले १९८० के दशक में नशीली पदार्थों की बढ़ती समस्या को अपने भाषणों में संबोधित करते थे जिसके कारण वह काफी लोकप्रिय थे ।

पंजाब की हरित क्रांति का नतीजा
--     हरित क्रांति के धोखे में पंजाब के किसान भारी मात्रा में कीटनाशकों का इस्तेमाल करने लगे जिसका नतीजा यह हुआ कि उत्पादक सामग्री पर खर्च बढ़ता गया और आय कम होती गई जिससे कर्ज का बोझ बढ़ता गया और खेती घाटे का उद्योग बन गई ।
--    खेती घाटे का उद्योग होने के कारण राज्य के युवाओं की नशीले पदार्थों के चपेट में आने की संभावना बढ़ गई है ।
--     रसायन पर निर्भर बीजों का उपयोग कम कर जैविक खेती को अपनाकर किसानों के निजी जीवन और इस सामाजिक समस्या का हल किया जा सकता है ।
Increased dependence on pesticides impacts farmers adversely, as it increases their burden of debt. (Photo: Reuters)

                           
कृषि में निवेश की ऊंची लागत
इससे खेती नकारात्मक अर्थव्यवस्था (नेगेटिव इकॉनमी) बन गई । जबकि २०११-१२ में चावल उत्पादन लागत १७०० रुपये और गेहूँ १५०० रुपये थी, न्यूनतम समर्थन मूल्य उससे कहीं कम १२८५ रुपये और १११० रुपये थे । १९९५ - २००१ और २००१-२००५ के बीच पंजाब में चावल की खेती करने वाले किसानों की शुद्ध आय ७७ रुपये से घटकर ७ रुपये और गेहूँ के खेती करने वालों के लिये ६७ रुपये से घटकर ३४ रुपये हो गई ।
नतीजा यह है कि आज किसान भारी ऋण तले दबे हैं जिनकी औसत ४१,५७६ रुपये प्रति एकड़ है । १७ प्रतिशत किसानों पर करीब ८०,००० रुपये प्रति एकड़ का कर्ज है । यही समस्या १९८४ की बगावत का कारण थी ।
कर्ज का बढता बोझ
१९८० के दशक में उत्पादक सामग्री के ऊंचे दामों से किसान परेशान थे । १९८४ की अप्रैल में भारतीय किसान संघ ने ऋणग्रस्तता के खिलाफ`कर्जा रोको' अभियान पर अपना ध्यान केंद्रित किया । १८ से २३ मई तक पंजाब के किसानों ने राज भवन (गवर्नर्स हाउस) का घेराव किया. २३ मई को एक एक काल किया गया कि भारतीय खाद्य निगम को अनाज न बेचा जाए ।
हरित क्रांति ने भारत को अनाज देने के लिये पंजाब को केन्द्र का उपनिवेश बना दिया था ।जैसा कि १३ अप्रैल १९८६ को पास किये गये गुरमाता (संकल्प) ने घोषणा कीः
"जब भी किसी देश या क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों या कड़ी मेहनत से कमाए लोगों की आय को जबरन लूटा जाता है, अगर उनके द्वारा उत्पादित वस्तुओं का मनमाने तरीके से मूल्य निर्धारित किया जाता है और उन खरीदे मालों को ऊंचे दामों पर बेचा जाता है , और इस आर्थिक शोषण की प्रक्रिया को पूरी करने के लिये लोगों या राष्ट्रों के मानवाधिकारों को कुचला जाता है तो यह उस देश, क्षेत्र या लोगों की गुलामी का सूचक है । आज सिख गुलामी की जंजीर में बँधे हैं ।"

४ जून १९८६ को किसान दिल्ली के अनाज की आपूर्ति पर रोक लगाने जा रहे थे । सेना को स्वर्ण मंदिर के अंदर भेजा गया जो कि सिखों का सबसे पवित्र मंदिर है ।और हिंसा का यह चक्र श्रीमति इन्दिरा गांधी और ३००० सिखों की क्रूर हत्या के साथ और भी गंभीर होता चला गया । सिखों और पंजाब के किसानों के लिये न्याय का मुद्दा आज भी जिन्दा है ।

पंजाब के युवाओं को नशीले पदार्थों से मुक्त करना बड़े न्याय का अहम हिस्सा है । युवाओं को अपने प्रदेश में अपना भविष्य देखने की जरूरत है । सिर्फ प्राकृतिक खेती प्रदेश और उसके लोगों को रोगमुक्त कर सकती है । पंजाब को समाज और खेतों में फैले जहर से मुक्ति पाने के लिये एक नई क्रांति की जरूरत है । हरित क्रांति की जहरीली विरासत को खत्म कर अपनी आजादी फिर से हासिल करने के लिये पंजाब को जैविक क्रांति की जरूरत है ।
(लेखिका डा॰ वंदना शिवा पर्यावरण कार्यकर्ता और नवधान्य संस्था की निदेशक हैं। उनकी वेबसाइट है - http://www.navdanya.org/home )
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इस ब्लॉग में छपे लेख स्वास्थ्य, सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक, पर्यावरण और राजनीतिक मुद्दों की समझ उन्नत करने के लिए केवल शैक्षिक उद्देश्यों के लिए उपलब्ध कराए गए हैं ।

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